ये एक बहु आयामी प्रश्न है इसलिए केवल ये सुन कर की बेटियों को दबा कर रखा जाता है इसका जवाब देना असंभव है। बेहतर होता की आप ये बताते की किस जगह पर बेटियों को दबाया गया है तो मैं ज्यादा अच्छे से आपको जवाब दे पाता।
लेकिन फिर भी आपकी बात को मान कर मै ये बता सकता हूँ की पधर्म के नाम पर जितना अधर्म फैला है उसका सबसे बड़ा कारन है की पुराणों में मिलावट की गयी है और आज का हिन्दू धर्म वैदिक मान्यताओं को भूल कर इस प्राणों की मिलावट को मान रहा है और इसी पर चल रहा है।
वेदों में महिलाओं के बारे में क्या कहा गया है आइये जानते हैं :
ऋग्वेद से: नारीत्व की स्थिति पर, वेद यह घोषणा करते हैं कि महिलाएं महान बुद्धि और गुणों का अवतार हैं। उदाहरण के लिए ऋग्वेद का ये मंत्र देखिये:
इयमददाद्रभसमृणच्युतं दिवोदासं वध्र्यश्वाय दाशुषे । या शश्वन्तमाचखादावसं पणिं ता ते दात्राणि तविषा सरस्वति ॥6.61.1॥
पदार्थः हे (देवि) प्रकाशमान (सरस्वति) परमविदुषी स्त्री ! जैसे (विश्वा) समस्त (आयूंषि) आयुर्दा (त्वे) तुझे (देव्याम्) विदुषी में (श्रिता) आश्रित हैं सो तू (शुनहोत्रेषु) पाई है योगज विद्या जिन्होंने उनके बीच (मत्स्व) आनन्द कर (नः) हमारे (प्रजाम्) सन्तानों को (दिदिड्ढि) उपदेश दे ॥१७ ॥
भावार्थः सब विद्वान् जन अपनी-अपनी विदुषी स्त्रियों के प्रति ऐसा उपदेश देवें कि तुमको सबकी कन्यायें पढ़ानी चाहिये और सबकी स्त्री अच्छे प्रकार सिखानी चाहिये ॥१७ ॥
अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ताइव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥2.41.16॥
पदार्थः हे (अम्बितमे) अतीव पढ़ानेवाली (देवितमे) अतीव पण्डिता (नदीतमे) अतीव अप्रकट विद्या का उपदेश करने (सरस्वति) बहुविज्ञान रखनेवाली (अम्ब) माता अध्यापिका जो (अप्रशस्ताइव) अप्रशस्तों के समान हम लोग (स्मसि) हैं उन (नः) हम लोगों को (प्रशस्तिम्) प्रशंसा को प्राप्त (कृधि) करो ॥१६ ॥
भावार्थः जितनी कुमारी हैं, वे विदुषियों से विद्या अध्ययन करें और वे कुमारी ब्रह्मचारिणी विदुषियों की ऐसी प्रार्थना करें कि आप हम सबों को विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें ॥१६ ॥
इमा ब्रह्म सरस्वति जुषस्व वाजिनीवति । या ते मन्म गृत्समदा ऋतावरि प्रिया देवेषु जुह्वति ॥2.41.18॥
पदार्थः हे (ऋतावरि) सत्याचरणयुक्त (वाजिनीवति) या बहुत ऐश्वर्य और अन्नादि पदार्थयुक्त (सरस्वति) बहुत विज्ञानवाली तू जैसे (गृत्समदाः) आनन्द जिन्होंने ग्रहण किया है वे (या) जिन (इमा) इन (ते) तेरे (प्रिया) मनोहर विज्ञान वा (मन्म) साधारण विद्वानों को (देवेषु) विद्या की कामना करनेवालों में (जुह्वति) स्थापन करते हैं उन (ब्रह्म) विज्ञानों को तू (जुषस्व) सेवन कर ॥१८ ॥
भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे विद्वान् पुरुष कुमार ब्रह्मचारियों को अच्छी शिक्षा से पढ़ावें, वैसे विदुषी स्त्रियाँ कुमारी ब्रह्मचारिणी स्त्रियों को अच्छी शिक्षा से पढ़ावें ॥१८ ॥
प्रेतां यज्ञस्य शंभुवा युवामिदा वृणीमहे । अग्निं च हव्यवाहनम् ॥2.41.19॥
पदार्थः हे स्त्री पुरुषो ! जो (शम्भुवा) सुख की सम्भावना करानेवाले (युवाम्) दोनों स्त्री-पुरुष (यज्ञस्य) यज्ञ की विद्याओं को (प्रेताम्) प्राप्त होते (च) और (हव्यवाहनम्) हव्य द्रव्य को पहुँचानेवाले (अग्निम्) अग्नि को प्राप्त होते (इत्) उन्हीं को हम लोग (आ,वृणीमहे) अच्छे प्रकार स्वीकार करते हैं ॥१९ ॥
भावार्थः सब मनुष्यों को पुत्रों के अध्यापकों और पुत्री की अध्यापिकाओं को निरन्तर नियुक्त करना चाहिये, जिससे स्त्री-पुरुषों में पूर्ण विद्याओं का प्रचार हो ॥१९ ॥
द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम् । यज्ञं देवेषु यच्छताम् ॥2.41.20॥
पदार्थः हे स्त्री पुरुषो ! आप (द्यावापृथिवी) सूर्य्य भूमि के समान (अद्य) आज (नः) हमारे (इमम्) इस (सिध्रम्) शास्त्रबोध के प्रकाश के निमित्त (दिविस्पृशम्) विज्ञान प्रकाश में जिससे स्पर्श करते हैं उस (यज्ञम्) पढ़ने-पढ़ाने की सङ्गति स्वरूप यज्ञ को (देवेषु) विद्वानों में (यच्छताम्) स्थापन करो ॥२० ॥
भावार्थः अध्यापक और उपदेशकों से जैसे सूर्य्य और भूमि सबको सर्वथा उन्नति देते हैं, वैसे स्त्री पुरुषों में विद्या अच्छे प्रकार विस्तारनी चाहिये ॥२० ॥
चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम् । द्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्या पतिम् ॥10.85.7॥
पदार्थः (सूर्या) सूर्यकान्तिसदृश योग्य नववधू (पतिम्-अयात्) पति-वर को प्राप्त होती है, (उपबर्हणं चित्तिः-आ) शिर का भूषण चेतानेवाली विद्या है (अभ्यञ्जनं चक्षुः-आः) नेत्र को सुन्दर बनानेवाला अञ्जन उसका यथार्थ दिखानेवाला स्नेहदर्शन है (कोशः-द्यौः-भूमिः आसीत्) कोश अर्थात् धनरक्षणस्थान के समान द्यावापृथिवीमय सब जगत् है, माता-पिता हैं ॥७ ॥
भावार्थः सुयोग्य वधू वही कहलाती है, जिसकी विद्या ज्ञान ही मस्तक का भूषण है और उसका स्नेहदर्शन-स्नेहदृष्टि आँख का अञ्जन है, उसकी सम्पत्ति समस्त प्राणिजगत् या माता-पिता का आश्रय है, ऐसी वधू सुख शान्ति को प्राप्त करती है ॥७ ॥
सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥1.164.40॥
पदार्थः हे (अध्न्ये) न हनने योग्य गौ के समान वर्त्तमान विदुषी ! तू (सुयवसात्) सुन्दर सुखों को भोगनेवाली (भगवती) बहुत ऐश्वर्यवती (भूयाः) हो कि (हि) जिस कारण (वयम्) हम लोग (भगवन्तः) बहुत ऐश्वर्ययुक्त (स्याम) हों । जैसे गौ (तृणम्) तृण को खा (शुद्धम्) शुद्ध (उदकम्) जल को पी और दूध देकर बछड़े आदि को सुखी करती है वैसे (विश्वदानीम्) समस्त जिसमें दान उस क्रिया का (आचरन्ती) सत्य आचरण करती हुई (अथो) इसके अनन्तर सुख को (अद्धि) भोग और विद्यारस को (पिब) पी ॥ ४० ॥
भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जबतक माताजन वेदवित् न हों तबतक उनमें सन्तान भी विद्यावान् नहीं होते हैं । जो विदुषी हो स्वयंवर विवाह कर सन्तानों को उत्पन्न कर उनको अच्छी शिक्षा देकर उन्हें विद्वान् करती हैं, वे गौओं के समान समस्त जगत् को आनन्दित करती हैं ॥ ४० ॥
गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी ।
अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥1.164.41॥
पदार्थः हे स्त्री-पुरुषो ! जो (एकपदी) एक वेद का अभ्यास करनेवाली वा (द्विपदी) दो वेद जिसने अभ्यास किये वा (चतुष्पदी) चार वेदों की पढ़ानेवाली वा (अष्टापदी) चार वेद और चार उपवेदों की विद्या से युक्ता वा (नवपदी) चार वेद, चार उपवेद और व्याकरणादि शिक्षायुक्त (बभूवुषी) अतिशय करके विद्याओं में प्रसिद्ध होती और (सहस्राक्षरा) असंख्यात अक्षरोंवाली होती हुई (परमे) सबसे उत्तम (व्योमन्) आकाश के समान व्याप्त निश्चल परमात्मा के निमित्त प्रयत्न करती है और (गौरीः) गौरवर्णयुक्त विदुषी स्त्रियों को (मिमाय) शब्द कराती अर्थात् (सलिलानि) जल के समान निर्मल वचनों को (तक्षती) छाँटती अर्थात् अविद्यादि दोषों से अलग करती हुई (सा) वह संसार के लिये अत्यन्त सुख करनेवाली होती है ॥ ४१ ॥
भावार्थः जो स्त्री समस्त साङ्गोपाङ्ग वेदों को पढ़के पढ़ाती हैं, वे सब मनुष्यों की उन्नति करती हैं ॥ ४१ ॥
अथर्ववेद से :
चित्तिराउपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्। द्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्यापतिम् ॥14.1.6॥
भाषार्थः (चित्तिः) चेतना [कन्या की] (उपबर्हणम्) छोटी ओढ़नी [समान] (आः) होवे, (चक्षुः) दर्शनसामर्थ्य (अभ्यञ्जनम्) उबटन [शरीर मलने के द्रव्य के तुल्य] (आः) होवे। (द्यौः) आकाश और (भूमिः) भूमि (कोशः) निधिमञ्जूषा [पेटी पिटारी समान] (आसीत्) होवे, (यत्) जब (सूर्या) प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली] कन्या (पतिम्) पतिको (अयात्) प्राप्त होवे ॥६॥
भावार्थः जब कन्या बाहिरीउपकरणों की उपेक्षा करके भीतरी विद्याबल से चेतन्य स्वभाव, और पदार्थों को दिव्यदृष्टि से देखनेवाली, और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने करानेवाली हो, तब सुयोग्य पति से ब्याह करे ॥६॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।८५।७ ॥ कन्यायें तब विवाह करें जब वो बाहरी उपकरणों को छोडकर विद्याबल से चैतन्य स्वभाव से पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने के वाली हो जाये तब सुयोग्य पती का वरण करे । यानि बाल विवाह का स्पष्ट खंडन है।
या विश्पत्नीन्द्रमसि प्रतीची सहस्रस्तुकाभियन्ती देवी। विष्णोः पत्नि तुभ्यं राता हवींषि पतिं देवि राधसे चोदयस्व ॥7.46.3॥
भाषार्थः (या) जो (विश्पत्नी) सन्तानों की पालनेवाली, (प्रतीची) निश्चित ज्ञानवाली, (सहस्रस्तुका) सहस्रों स्तुतिवाली, (अभियन्ती) चारों ओर चलती हुई (देवी) देवी तू (इन्द्रम्) ऐश्वर्य को (असि=अससि) ग्रहण करती है। (विष्णोः) पत्नि) हे कामों में व्यापक वीर पुरुष की पत्नी ! (तुभ्यम्) तेरे लिये (हवींषि) देने योग्य पदार्थ (राता) दिये गये हैं, (देवि) हे देवी ! (पतिम्) अपने पति को (राधसे) सम्पत्ति के लिये (चोदयस्व) आगे बढ़ा ॥३॥
भावार्थः पती कि धनअर्जित करने के तरिके बता गृहलक्ष्मी। सन्तान को पालने वाली, निश्चित ज्ञान वाली, सह्त्रों स्तुति वाली और चारों और प्रभाव डालने वाली स्त्री तुम ऐश्वर्य पाती हो हे सुयोग्य पती की पत्नी अपने पती को सम्पत्ती के लिये आगे बढाओ।
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा। जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्ढि नः ॥7.46.1॥
भाषार्थः (पृथुष्टुके) हे बहुत स्तुतिवाली ! (सिनीवालि) अन्नवाली [वा प्रेमयुक्त बल करनेवाली] गृहपत्नी ! (या) जो तू (देवानाम्) दिव्यगुणों की (स्वसा) अच्छे प्रकार प्रकाश करनेवाली वा ग्रहण करनेवाली (असि) है, सो तू (हव्यम्) ग्रहण करने योग्य, (आहुतम्) सब प्रकार स्वीकार किये व्यवहार का (जुषस्व) सेवन कर और (देवि) हे कामनायोग्य देवी ! (नः) हमारे लिये (प्रजाम्) सन्तान (दिदिड्ढि) दे ॥१॥
भावार्थः जिस घर में अन्नवती, सुशिक्षित, व्यवहारकुशल स्त्रियाँ होती हैं, वहीं उत्तम सन्तान उत्पन्न होते हैं ॥१॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-२।३२।६। और यजुर्वेद−३४।१०। तथा-निरु० ११।३२। में व्याख्यात है ॥
कुहूर्देवानाममृतस्य पत्नी हव्या नो अस्य हविषो जुषेत। शृणोतु यज्ञमुशती नो अद्य रायस्पोषं चिकितुषी दधातु ॥7.47.2॥
भाषार्थः (देवानाम्) विद्वानों के बीच (अमृतस्य) अमर [पुरुषार्थी] पुरुष की (पत्नी) पत्नी (हव्या) बुलाने योग्य वा स्वीकार करने योग्य, (कुहूः) कुहू अर्थात् विचित्र स्वभाववाली स्त्री (नः) हमारे (अस्य) इस (हविषः) ग्रहण योग्य कर्म का (जुषेत) सेवन करे। (यज्ञम्) सत्सङ्ग की (उशती) इच्छा करती हुई (चिकितुषी) विज्ञानवती वह (अद्य) आज (नः) हमें (शृणोतु) सुने और (रायः) धन की (पोषम्) वृद्धि को (दधातु) पुष्ट करे ॥२॥
भावार्थः जिस घर में यशस्वी पुरुष की पत्नी सब घरवालों की सुधि रखनेवाली और परिमित व्ययवाली होती है, वहाँ वह धन बढ़ाकर सबको आनन्द देती है ॥२॥
यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि। ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा ॥7.48.2॥
भाषार्थः (राके) हे सुखदायिनी ! वा पूर्णमासी समान शोभायमान पत्नी ! (याः) जो (ते) तेरी (सुमतयः) सुमतियें (सुपेशसः) बहुत सुवर्णवाली हैं, (याभिः) जिनसे तू (दाशुषे) धन देनेवाले [मुझ पति] को (वसूनि) अनेक धन (ददासि) देती है। (सुभगे) हे सौभाग्यवती ! (ताभिः) उन [सुमतियों] से (नः) हमें (सहस्रपोषम्) सहस्र प्रकार से पुष्टि को (रराणा) देती हुई, (सुमनाः) प्रसन्नमन होकर (अद्य) आज (उपागहि) समीप आ ॥२॥
भावार्थः विदुषी, सुलक्षणा, विचारशील, प्रसन्नचित्त पत्नी धन और सम्पत्ति की रक्षा और बढ़ती करती हुई पतिप्रिया होकर घर में सुख बढ़ाती रहे ॥२॥
ब्रह्मापरंयुज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मान्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः। अनाव्याधां देवपुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलोके वि राज ॥14.1.64॥
भाषार्थः (ब्रह्म) ब्रह्म [परब्रह्म परमात्मा] (पूर्वम्) पहिले, (ब्रह्म) ब्रह्म (अपरम्) पीछे, (ब्रह्म)ब्रह्म (अन्ततः) अन्त में और (मध्यतः) मध्य में, और (ब्रह्म) ब्रह्म (सर्वतः)सर्वत्र (युज्यताम्) ध्यान किया जावे। [हे वधू !] (अनाव्याधाम्) छेदनरहित [अटूट, दृढ़] (देवपुराम्) देवताओं [विद्वानों] के गढ़ में (प्रपद्य) पहुँचकर (शिवा) कल्याणकारिणी और (स्योना) सुखदायिनी तू (पतिलोके) पतिलोक [पति के समाज]में (वि राज) विराजमान हो ॥६४॥
भावार्थः हे स्त्री! तुम हमारे घर की प्रत्येक दिशा मे वैदिक ज्ञान का प्रयोग करो। हे वधु! विद्वानों के घर मे पहुंच कर कल्याणकारिणी और सुखदायिनी होकर विराजमान हो।
शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा आपश्चरुमव सर्पन्तु शुभ्राः। अदुः प्रजां बहुलान्पशून्नः पक्तौदनस्य सुकृतामेतु लोकम् ॥11.1.17॥
भाषार्थः (शुद्धाः) शुद्धस्वभाववाली, (पूताः) पवित्र आचरणवाली, (यज्ञियाः) पूजनीय (योषितः) सेवायोग्य, (शुभ्राः) चरित्रवाली (इमाः) यह (आपः) विद्या में व्याप्त स्त्रियाँ (चरुम्) ज्ञान को (अव) निश्चय करके (सर्पन्तु) प्राप्त हों। इन [शिक्षित स्त्रियों] ने (नः) हमें (प्रजाम्) सन्तान और (बहुलान्) बहुविध (पशून्) [गौ भैंस आदि] पशु (अदुः) दिये हैं, (ओदनस्य) सुख बरसानेवाले [वा मेघरूप परमेश्वर] का (पक्ता) पक्का [मन में दृढ़] करनेवाला मनुष्य (सुकृताम्) सुकर्मियों के (लोकम्) समाज को (एतु) पहुँचे ॥१७॥
भावार्थः गुणवती स्त्रियों के शुभ प्रबन्ध से उत्तम सन्तान और उत्तम गौ, भैंस, बकरी आदि उपकारी पशु घर में होते हैं और परमेश्वर की आज्ञा पालनेवाला पुरुष अवश्य प्रतिष्ठा पाता है ॥१७॥ ये स्त्रियां शुद्ध, पवित्र और यज्ञीय (यज्ञ के समान पुजनीय) हैं, ये प्रजा, पशु और अन्न देती है।
इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं स्पृशन्ताम्। अनश्रवो अनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे ॥12.2.31॥
भाषार्थः (इमाः) यह [विदुषी] (नारीः) नारियाँ (अविधवाः) सधवा [मनुष्योंवाली] और (सुपत्नीः) धार्मिक पतियोंवाली होकर (आञ्जनेन) यथावत् मेल से और (सर्पिषा) घी आदि [सार पदार्थ] से (सं स्पृशन्ताम्) संयुक्त रहें। (अनश्रवः) बिना आसुओंवाली, (अनमीवाः) बिना रोगोंवाली, (सुरत्नाः) सुन्दर-सुन्दर रत्नोंवाली (जनयः) माताएँ (अग्ने) आगे-आगे (योनिम्) मिलने के स्थान [घर, सभा आदि] में (आ रोहन्तु) चढ़ें ॥३१॥
भावार्थः जो विदुषी स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य आदि शुभ गुणवाली होती हैं, वे अपने विद्वान् सुयोग्य कुटुम्बियों, पतियों और पुत्र आदि के साथ शरीर और आत्मा से स्वस्थ रहकर बहुत धनवती और सुखवती होकर अग्रगामिनी बनती हैं ॥३१॥
अमोऽहमस्मिसा त्वं सामाहमस्म्यृक्त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम्। ताविह सं भवावप्रजामा जनयावहै ॥14.2.71॥
भाषार्थः [हे वधू !] मैं ज्ञानवान् हूँ, सो तू [ज्ञानवती है], मैं सामवेद [मोक्षज्ञान के समान सुखदायक] हूँ, तू ऋग्वेद की ऋचा [पदार्थों के गुणों की बड़ाई बतानेवाली विद्या के तुल्य आनन्ददेनेवाली] है, मैं सूर्य [वृष्टि आदि करनेवाले रवि के समानउपकारी] हूँ, और तू पृथिवी [अन्न आदि उत्पन्न करनेवाली भूमि केसमान उत्तम सन्तान उत्पन्न करनेवाली] है। वे हम दोनों यहाँ [गृहाश्रममें] पराक्रमी होवें, और प्रजा [उत्तम सन्तान] को उत्पन्न करें ॥७१॥
भावार्थः वधू-वर राज्यप्रबन्धसे सन्तुष्ट होकर और अनेक प्रकार की विद्या और सम्पत्ति की प्राप्ति और सुसन्तानकी उत्पत्ति से सुखी होवें ॥७१॥
अहं वदामि नेत्त्वं सभायामह त्वं वद। ममेदसस्त्वं केवलो नान्यासां कीर्तयाश्चन ॥7.38.4॥
भाषार्थः (अहम्) मैं (न इत्) अभी (वदामि) बोल रही हूँ, (त्वम् त्वम्) तू तू (अह) भी (सभायाम्) सभा में (वद) बोल। (त्वम्) तू (केवलः) केवल (मम इत्) मेरा ही (असः) होवे, (चन) और (अन्यासाम्) दूसरी स्त्रियों का (न कीर्तयाः) तू न ध्यान करे ॥४॥
भावार्थः वधू और वर पञ्चों के सन्मुख दृढ़ प्रतिज्ञा करके सदाचारी रह कर धर्म पर चलते रहें ॥४॥ यहाँ परायी स्त्री का गमन करना पाप सिद्ध हो जाता है।
यदक्षेषु वदा यत्समित्यां यद्वा वदा अनृतं वित्तकाम्या। समानं तन्तुमभि संवसानौ तस्मिन्त्सर्वं शमलं सादयाथः ॥12.3.52॥
भाषार्थः [हे स्त्री वा पुरुष !] जो कुछ [झूठ] अभियोगों [राजगृह के विवादों] में, [अथवा] जो कुछ [झूठ] संग्राम में तू बोले, अथवा जो कुछ झूठ धन की कामना से तू बोले। एक ही तन्तु [वस्त्र] में ढके हुए तुम दोनों [स्त्री-पुरुषो] उस [झूठ] में सब भ्रष्ट कर्म को स्थापित करोगे ॥५२॥
भावार्थः सब स्त्री-पुरुषों को योग्य है कि एक-दूसरे को अपने सदृश समझ कर कठिन से कठिन आपत्ति में भी असत्य न बोलें, असत्य ही सब पापों का मूल है ॥५२॥ यही झूठ ही सरे वैवाहिक कलह का कारन है। यदि ये झूठ न बोलै जाये तो कितने ही विवाह टूटने से बच जाये।
यजुर्वेद से:
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते । गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः ॥
पदार्थः हे (शरव्ये) बाणविद्या में कुशल (ब्रह्मसंशिते) वेदवेत्ता विद्वान् से प्रशंसा और शिक्षा पाये हुए सेनाधिपति की स्त्री ! तू (अवसृष्टा) प्रेरणा को प्राप्त हुई (परा, पत) दूर जा (अमित्रान्) शत्रुओं को (गच्छ) प्राप्त हो और उनके मारने से विजय को (प्र, पद्यस्व) प्राप्त हो, (अमीषाम्) उन दूर देश में ठहरे हुए शत्रुओं में से मारने के विना (कम्, चन) किसी को (मा) (उच्छिषः) मत छोड़ ॥४५ ॥
भावार्थः सभापति आदि को चाहिये कि जैसे युद्धविद्या से पुरुषों को शिक्षा करें, वैसे स्त्रियों को भी शिक्षा करें। जैसे वीरपुरुष युद्ध करें, वैसे स्त्री भी करे। जो युद्ध में मारे जावें, उनसे शेष अर्थात् बचे हुए कातरों को निरन्तर कारागार में स्थापन करें ॥४५ ॥
काश यदि मुगलों के समय राजपूतों को भी ये वेद ज्ञान होता तो हमारी कई स्त्रियां जौहर न करती बल्कि रानी लक्ष्मी बाई की तरह उनसे लड़ कर अपने प्राण देती।
स्योनासि सुषदासि क्षत्रस्य योनिरसि। स्योनामासीद सुषदामासीद क्षत्रस्य योनिमासीद ॥२६॥10.26॥
पदार्थः हे राणी ! जिसलिये आप (स्योना) सुखरूप (असि) हैं, (सुषदा) सुन्दर व्यवहार करनेवाली (असि) हैं, (क्षत्रस्य) राज्य के न्याय के (योनिः) करनेवाली (असि) हैं, इसलिये आप (स्योनाम्) सुखकारक अच्छी शिक्षा में (आसीद) तत्पर हूजिये, (सुषदाम्) अच्छे सुख देनेहारी विद्या को (आसीद) अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये तथा कराइये और (क्षत्रस्य) क्षत्रिय कुल की (योनिम्) राजनीति को (आसीद) सब स्त्रियों को जनाइये ॥२६॥
भावार्थः राजाओं की स्त्रियों को चाहिये कि सब स्त्रियों के लिये न्याय और अच्छी शिक्षा देवें और स्त्रियों का न्यायादि पुरुष न करें, क्योंकि पुरुषों के सामने स्त्री लज्जित और भययुक्त होकर यथावत् बोल वा पढ़ ही नहीं सकती ॥२६॥ शासकों की स्त्रियां अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें। जैसे राजा लोगों का न्याय करतें हैं। वैसे ही रानी को भी न्याय करना चाहिये उसे समान अधिकार है जो राजा के हैं।
सीद त्वं मातुरस्याऽउपस्थे विश्वान्यग्ने वयुनानि विद्वान्। मैनां तपसा मार्चिषाऽभिशोचीरन्तरस्या शुक्रज्योतिर्विभाहि ॥१५ ॥12.15॥
पदार्थः हे (अग्ने) विद्या को चाहनेवाले पुरुष ! (त्वम्) आप (अस्याम्) इस माता के विद्यमान होने पर (विभाहि) प्रकाशित हो (शुक्रज्योतिः) शुद्ध आचरणों के प्रकाश से युक्त (विद्वान्) विद्यावान् आप (अस्याः) इस प्रत्यक्ष पृथिवी के समान आधाररूप (मातुः) इस माता की (उपस्थे) गोद में (सीद) स्थित हूजिये। इस माता से (विश्वानि) सब प्रकार की (वयुनानि) बुद्धियों को प्राप्त हूजिये। (एनाम्) इस माता को (अन्तः) अन्तःकरण में (मा) मत (तपसा) सन्ताप से तथा (अर्चिषा) तेज से (मा) मत (अभिशोचीः) शोकयुक्त कीजिये, किन्तु इस माता से शिक्षा को प्राप्त होके प्रकाशित हूजिये ॥१५ ॥
भावार्थः जो विद्वान् माता के द्वारा विद्या और अच्छी शिक्षा से युक्त किया हुआ, माता का सेवक, जैसे माता पुत्रों को पालती है, वैसे प्रजाओं का पालन करे, वह पुरुष राज्य के ऐश्वर्य्य से प्रकाशित होवे ॥१५ ॥ आप प्रतिभा चाहते हैं, तो माँ के पास जाएँ। उनके आशीर्वाद से आप सभी विषयों के विद्वान होंगे। माता को दु:खी मत करो। नेक माँ के शुद्ध आशीर्वाद से स्वयं को आलोकित करें।
वैदिक ऋषिकाएँ:
ऋषिका वेदों की ऋचाओँ का या मन्त्रों का साक्षात्कार करने वाली महिलाओं को कहते हैं। ऋषिकाएँ सामान्यतः अपने ज्ञान के अनुसार ही ऋषिका पद को प्राप्त होती थीं। वेदों में अनेक ऋषिकाओँ का उल्लेख प्राप्त है, जिन में से कुछ ३६ नाम निम्न प्रकार हैं :
अदिति, अघन्या, बृहति, चंद्र, देवकाम, देवी, ध्रुव, हव्य, इड़ा, ज्योत, काम्या, क्षमा, माही, मेना, नारी, पुरंधीह, रंता, रतावरी, संजेया, सरस्वती, सिम्ही, शिवी, शिवतमा, स्त्री, सुभागा, सुभद्रा, सुमंगली, सुशेवा, सुवर्चा, सुयमा, स्योना, वीरिणी, विश्रुत, यशस्वती और योशी।
उपनिषदों में स्त्रियां
बृहदारण्यक उपनिषद् अद्वैत वेदांत और संन्यासनिष्ठा का प्रतिपादक है। इस उपनिषद् का ब्रह्मनिरूपणात्मक अधिकांश उन व्याख्याओं का समुचच्य है जिनसे अजातशत्रु ने गार्ग्य बालाकि की, जैवलि प्रवाहण ने श्वेतकेतु की, याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी और जनक की तथा जनक के यज्ञ में समवेत गार्गी और जारत्कारव आर्तभाग इत्यादि आठ मनीषियों की ब्रह्मजिज्ञासा निवृत्त की थी।
आइये इन महिलाओं के बारे में एक एक कर के जानते हैं :
१- मैत्रेयी: मैत्रेयी(संस्कृत: मैत्रेयी) ("बुद्धिमान एक"[1])) एक विदुषी एवं ब्रह्मवादिनी स्त्री थीं, जो प्राचीन भारत में बाद केवैदिक काल के दौरान रहते थे। उनका उल्लेख बृहदारण्यक उपनिषद[2] में वैदिक ऋषि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियों में से एक के रूप में किया गया है; वह 8 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास रहने का अनुमान है। हालांकि, हिंदू महाकाव्य महाभारत और गृहसूत्र में, मैत्रेयी को एक अद्वैत दार्शनिक के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्होंने कभी शादी नहीं की। प्राचीन संस्कृत साहित्य में, उन्हें ब्रह्मवादिनी (वेद की व्याख्या करने वाली) के रूप में जाना जाता है।
मैत्रेयी प्राचीन भारतीय ग्रंथों में दिखाई देती हैं, जैसे कि एक संवाद में जहां वह बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य के साथ एक संवाद में आत्मान (आत्मा या स्वयं) की हिंदू अवधारणा की पड़ताल करती हैं। इस संवाद के अनुसार, प्रेम एक व्यक्ति की आत्मा से प्रेरित होता है, और मैत्रेयी आत्मान और ब्रह्म की प्रकृति और उनकी एकता, अद्वैत दर्शन के मूल पर चर्चा करती हैं। यह मैत्रेयी-याज्ञवल्क्य संवाद सुरेश्वर की वर्तिका, एक भाष्य का विषय है।
वे मित्र ऋषि की कन्या और महर्षि याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी थीं। याज्ञवल्क्य की ज्येष्ठा पत्नी कात्यायनी अथवा कल्याणी मैत्रेयी से बड़ी ईर्ष्या रखती थीं। कारण यह था कि अपने गुणों के कारण इसे पति का स्नेह ओक्षाकृत अधिक प्राप्त आध्यात्मिक विषयों पर याज्ञवल्क्य के साथ इनके अनेक संवादों का उल्लेख प्राप्त है। (बृह० उपनिषद : २-४-१-२; ४-५-१-१५)। पति के संन्यास लेने पर इन्होंने पति से अत्यधिक ज्ञान का भाग माँगा और अंत में से आत्मज्ञान प्राप्त करने के अनंतर, अपनी सारी संपत्ति सौत को देकर यह उनके साथ वन को चली गई। आश्वलायन गृह्यसूत्र के ब्रह्मयज्ञांगतर्पण में मैत्रेयी का नाम सुलभा के साथ आया है।
२- गार्गी वाचकन्वी: गार्गी वाचकन्वी ' (लगभग 700 ईसा पूर्व का जन्म) एक प्राचीन भारतीय दार्शनिक थी। वेदिक साहित्य में, उन्हें एक महान प्राकृतिक दार्शनिक, वेदों के प्रसिद्ध व्याख्याता, और ब्रह्मा विद्या के ज्ञान के साथ ब्रह्मवादी के नाम से जाना जातीं है। बृहदारण्यक उपनिषद के छठी और आठवीं ब्राह्मण में, उसका नाम प्रमुख है क्योंकि वह विद्या के राजा जनक द्वारा आयोजित एक दार्शनिक बहस में ब्राह्मण्य में भाग लेती है और संयम (आत्मा) के मुद्दे पर परेशान प्रश्नों के साथ ऋषि यज्ञवल्क्य को चुनौती देती है। यह भी कहा जाता है कि ऋग्वेद में कई भजन लिखे हैं। वह अपने सभी ब्रह्मचर्य बने और परंपरागत हिंदुओं द्वारा पूजा में आयोजित किया गया।
ऋषि गर्ग की वंश में ऋषि वचक्नु की बेटी गर्गि, का नाम उसके पिता के नाम पर गर्गि वाचक्नवी के रूप में किया गया था।
वृहदारण्यक उपनिषद् में इनका याज्ञवल्क्यजी के साथ बडा ही सुन्दर शास्त्रार्थ आता है। एक बार महाराज जनक ने श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी की परीक्षा के निमित्त एक सभा की और एक सहस्त्र सवत्सा सुवर्ण की गौएँ बनाकर खडी कर दीं। सबसे कह दिया-जो ब्रह्मज्ञानी हों वे इन्हें सजीव बनाकर ले जायँ। सबकी इच्छा हुई, किन्तु आत्मश्लाघा के भय से कोई उठा नहीं। तब याज्ञवल्क्यजी ने अपने एक शिष्य से कहा- बेटा! इन गौओं को अपने यहाँ हाँक ले चलो।[1]
इतना सुनते ही सब ऋषि याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ करने लगे। भगवान याज्ञवल्क्यजी ने सबके प्रश्नों का यथाविधि उत्तर दिया। उस सभा में ब्रह्मवादिनी गार्गी भी बुलायी गयी थी। सबके पश्चात् याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ करने वे उठी। उन्होंने पूछा-भगवन्! ये समस्त पार्थिव पदार्थ जिस प्रकार जल मे ओतप्रोत हैं, उस प्रकार जल किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- जल वायु में ओतप्रोत है।
गार्गी- वायु किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- वायु आकाश में ओतप्रोत है।
गार्गी- अन्तरिक्ष किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- अन्तरिक्ष गन्धर्वलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- गन्धर्वलोक आदित्यलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- आदित्यलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- आदित्यलोक चन्द्रलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- चन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- नक्षत्रलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- नक्षत्रलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- देवलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- देवलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- प्रजापतिलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- प्रजापतिलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- ब्रह्मलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत है?
तब याज्ञवल्क्य ने कहा- गार्गी! अब इससे आगे मत पूछो। इसके बाद महर्षि याज्ञवक्ल्यजी ने यथार्थ सुख वेदान्ततत्त्व समझाया, जिसे सुनकर गार्गी परम सन्तुष्ट हुई और सब ऋषियों से बोली-भगवन्! याज्ञवल्क्य यथार्थ में सच्चे ब्रह्मज्ञानी हैं। गौएँ ले जाने का जो उन्होंने साहस किया वह उचित ही था। गार्गी परम विदुषी थीं, वे आजन्म ब्रह्मचारिणी रहीं।
और कितने प्रमाण दू आपको की हमारा धर्म स्त्री विरोधी नहीं है। इतने प्रमाण तो दे दिए। बल्कि हमारे यहाँ कई अनुष्ठान ऐसे हैं जो केवल स्त्री ही कर सकती है। जैसे माता रानी का श्रृंगार।
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